छत्तीसगढ़ की झांकी, छत्तीसगढ़ के बहादुर बच्चों और बस्तर के गौर माड़िया नृत्य करते बच्चे आकर्षण का केन्द्र बने
रायपुर 26 जनवरी 2008
गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली के राजपथ पर छत्तीसगढ़ के लोक वाद्य यंत्रों की धुन ने अदभुत समा बांधा। राजपथ पर छत्तीसगढ़ राज्य की समृध्द कला और संस्कृति का प्रदर्शन करने वाली इस झांकी में छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोक वाद्य यंत्रों के प्रदर्शन ने राजपथ पर गणमान्य अतिथियों के साथ-साथ देश और विदेश के हजारों लोगों की प्रशंसा पायी।
इस झांकी में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा अपने सांस्कृतिक उत्सवों के दौरान उपयोग किये जाने वाले दुर्लभ वाद्य यंत्रों को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया। छत्तीसगढ़ की झांकी के अतिरिक्त हाथियों पर सवार छत्तीसगढ़ के पांच बहादुर बच्चों को भी उपस्थित लोगों की प्रशंसा मिली। इन बहादुर बच्चों में संजय चोपड़ा पुरस्कार प्राप्त राजनांदगांव के छह वर्ष के नन्हें युक्तार्थ श्रीवास्तव, सरगुजा के रवि कुमार एवं अवधेष कुमार झारिया, महासमुंद के मानस निषाद और दंतेवाडा का रविन्द्र हलदर शामिल थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र नागपुर के द्वारा छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का प्रसिध्द गौर माड़िया नृत्य भी प्रस्तुत किया गया। आकर्षक वेशभूषा , माड़िया ढोल और नृत्य करते स्कूली बच्चों ने राजपथ पर बस्तर की उमंग और उत्साह से लबरेज वातावरण निर्मित कर दिया ।
छत्तीसगढ़ के लोक वादय यंत्रों की इस झांकी में बस्तर की मुरिया आदिवासी महिलाओं द्वारा बजाये जाने वाले वादय यंत्र धनकुल , बिलासपुर के देवार आदिवासियों के पारम्परिक वादय यंत्र ढुगंरू , सरगुजा जिले के उरांव गोंड़ आदिवासियों के द्वारा बांस और रस्सी के सहारे बजाया जाने वाला ढोंक , यादव जाति के द्वारा बजाया जाने वाला बांस बाजा, छत्तीसगढ़ के गांवों में स्वर वाद्य के रूप में बजाया जाने वाला चिकारा , गोंड आदिवासियों का रोंजो, पारदी समुदाय का डॉहक , मांगलिक अवसरों पर बजाया जाने वाला टिमकी , बैंगा आदिवासियों द्वारा कर्मा नृत्य के समय उपयोग किया जाने वाला चटकोला , दो बांसों को विपरीत दिशा में जोड़ कर बनाया गया यंत्र अलगोजा , गुदुम , माड़िया ढोल और अन्य वादय यंत्रों को प्रदर्षित किया गया था ।
Comments
Post new comment