अशोक चक्र से सम्मानित मेजर दिनेश रघु रमन और उनके वीरतापूर्ण कार्य

मेजर दिनेश रघु रमन को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च शांतिकाल वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सम्मानित किया गया है । राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल राजपथ पर शनिवार को गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान यह पुरस्कार प्रदान करेंगी । इनके साथ तीन अन्य को 2 पैराशूट रेजिमेंट के कैप्टन हर्षन आर विशेष बल (मरणोपरांत), 8 जम्मू एवं कश्मीर लाइट एनफैंट्री के नायक सूबेदार चुन्नी लाल वीर चक्र, सेना मेडल (मरणोपरांत) तथा 9 मराठा लाइट इनफैंट्री (मरणोपरांत) के कर्नल वसंत वेनुगोपाल को जिन्हें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पिछले वर्ष अशोक चक्र पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गयी थी, उन्हें भी यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा ।

श्री एस के मूर्ति तथा श्रीमती माला के पुत्र मेजर दिनेश रघु रमन का जन्म 6 अप्रैल, 1978 में हुआ । उन्होंने नई दिल्ली के आई एन ए कालोनी स्थित केन्द्रीय विद्यालय से विद्यालय की शिक्षा प्राप्त की तथा 1996 में नेशनल डिफेंस एकेडमी के सदस्य बने । नेशनल डिफेंस एकेडमी से उत्तीर्ण होने के उपरांत उन्हें 19 जाट रेजिमेंट बटालियन में नियुक्त किया गया ।

अपनी संक्षिप्त एवं प्रभावशाली नौकरी के दौरान मेजर दिनेश रघु रमन ने विभिन्न नियुक्तियों में अपनी सेवा दी और द्रास में आपरेशन पराक्रम के दौरान उन्हें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया ।

मेजर दिनेश रघु रमन को 22 फरवरी, 2006 को 34 राष्ट्रीय रायफल बटालियन (जाट) में नियुक्त किया गया । उनकी नेतृत्व क्षमता और पेशेवर निपुणता की पहचान करते हुए उन्हें अरिपंथन में सी कंपनी का नेतृत्व दिया गया और उन्होंने इसका सफलतापूर्वक संचालन किया । जून, 2007 में आपरेशन नारावर के दौरान उन्होंने तीन कट्टर आतंकवादियों का सफाया किया ।

2 अक्टूबर, 2007 को 8 बजकर 20 मिनट पर मेजर दिनेश रघु रमन की कंपनी जम्मू एवं कश्मीर के बारामूला जिले के एक गांव में तैनात थी जहां पर आतंकवादियों से मुकाबला हो रहा था। 8 बजकर 55 मिनट पर उन्होंने गंभीर रूप से घायल अपने साथी अधिकारी की चीख पुकार सुनी । अद्मय साहस का परिचय देते हुए भारी गोली-बारी के बीच वे उसकी ओर रेंगते हुए बढे । उन्होंने उस जख्मी अधिकारी तथा अन्य दो सिपाहियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया । इसके बाद वे उन दो आतंकवादियों को भी मार गिराने में कामयाब हुए जो सैन्य टुकड़ियों पर कहर बरपा रहे थे । एक अन्य आतंकवादी ने दूसरे घर से मेजर रमन पर गोली चलाई । इस गोलीबारी में मेजर रमन गंभीर रूप से घायल हो गए । इसके बावजूद बिना किसी घबराहट के उन्होंने दल का नेतृत्व किया और उनका हौसला बनाए रखा । वे अचेत होने तक आतंकवादियों से लड़ते रहे और वीरगति को प्राप्त हुए।
मेजर रमन ने बहादुरी और नेतृत्व क्षमता का परिचय देते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है ।

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