गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह में आकर्षण का केन्द्र बनेंगे छत्तीसगढ़ के दुर्लभ लोक वाद्य

रक्षा मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति द्वारा झांकी चयनित
रायपुर 11 जनवरी 2008
गणतंत्र दिवस के अवसर पर इस महीने की 26 तारीख को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय समारोह में छत्तीसगढ़ के परम्परागत लोक संगीत और लोक नृत्यों से जुड़े दुर्लभ वाद्य यंत्र भी जनता के आकर्षण का केन्द्र बनेंगे। राष्ट्रीय राजधानी में विजय चौक पर गणतंत्र दिवस परेड के दौरान देश के विभिन्न राज्यों की मनोरम झांकियों के साथ इस वर्ष के लिए छत्तीसगढ़ के विभिन्न लोक वाद्य यंत्रों पर आधारित जनसंपर्क विभाग की झांकी का चयन कर लिया गया है। रक्षा मंत्रालय की उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति ने इसका चयन किया है।

इन दुर्लभ संगीत उपकरणों में धनकुल, ढुंगरू, ढोंक, तुरही (मउहर), बांस बाजा, रोंजो, डांहक, टिमकी, चटकोला, अलगोजा, गुदुम और माड़िया ढोल सहित चिकारा, तम्बूरा आदि तन्तु वाद्य शामिल हैं। आधुनिक समाज की भागदौड़ वाली जीवन शैली में इन विलुप्त होते वाद्ययंत्रों और उन पर आधारित छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों को देखना देश की नई पीढ़ी के लिए एक नया अनुभव होगा।

उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के पिछले वर्ष के राष्ट्रीय समारोह में छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोक शिल्प और वर्ष 2006 के राष्ट्रीय समारोह में राज्य के परम्परागत आभूषणों पर आधारित झांकियों ने भी देश-विदेश के लाखों दर्शकों का मन लुभाया था। इन दोनों झांकियों का निर्माण भी राज्य शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा किया गया था। लोक आभूषणों पर आधारित वर्ष 2006 की झांकी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

आगामी 26 जनवरी 2008 को गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय परेड के अवसर पर प्रदर्शित की जाने वाली झांकियों में दुर्लभ लोक वाद्यों के साथ लोगों को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक खूबियों से परिचित होने का मौका मिलेगा। लोक संगीत के इन सहज सरल लेकिन मिठास से परिपूर्ण वाद्य यंत्रों के साथ राज्य के आंचलिक कलाकारों के जत्थे लोक नृत्यों का भी प्रदर्शन करते चलेंगे। इसके लिए राज्य के लोक-कलाकारों का 32 सदस्यीय दल नई दिल्ली के लिए रवाना हो गया है, जहां राष्ट्रीय समारोह से पहले उनके द्वारा पूर्वाभ्यास किया जाएगा। इस दल में आदिवासी बहुल नवगठित नारायणपुर जिले के ग्राम देवगांव निवासी श्री रामू सिंह वड्डा के नेतृत्व में काकसार नृत्य के 18 और भिलाई नगर (जिला दुर्ग) निवासी श्री रिखी क्षत्रिय के नेतृत्व में 14 कलाकार शामिल हैं। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विशेषताओं और विविधताओं को यहां के लोक नृत्यों के साथ पुराने लोक वाद्यों के जरिए भी पहचाना जाता है। कृषि प्रधान ग्रामीण संस्कृति पर आधारित राज्य के लोक जीवन को ये दुर्लभ वाद्य यंत्र नयी ऊर्जा प्रदान करता है। जन्म से मृत्यु तक यहां के जन-जीवन से इन उपकरणों का गहरा जुड़ाव होता है। गणतंत्र दिवस की राष्ट्रीय झांकी के लिए चयनित इन वाद्य यंत्रों में धनकुल नामक वाद्य यंत्र बस्तर जिले की मुरिया जनजाति की महिलाओं द्वारा तीजा-जगार और दशहरा जगार जैसे त्यौहारों के अवसर पर बजाया जाता है। इस वाद्य यंत्र में मटका, धनुष, सूपा, चिरान काड़ी का उपयोग किया जाता है। बिलासपुर जिले में देवार समुदाय में प्रचलित ढुंगरू नामक वाद्य यंत्र तुम्बा और पटसन की रस्सी के सहारे बजाया जाता है। सरगुजा जिले के उरांव-गोंड़ आदिवासी ढोंक नामक वाद्य यंत्र से अपना मनोरंजन करते हैं। यह वाद्य यंत्र तुम्बा (लौकी के खोल), बांस तथा रस्सी के सहारे बजाया जाता है।

राज्य में यादव समुदाय के लोग अपने विभिन्न परम्परागत उत्सवों में लोक नृत्य के साथ तुरही (मउहर) नामक वाद्य यंत्र का भी इस्तेमाल करते हैं। छत्तीसगढ़ के बांस गीत का एक अलग महत्व और माधुर्य है। राज्य के यादव समुदाय में ही बांस बाजा भी प्रचलित है। इसमें एक लम्बे बांस में छेद बना कर लम्बी तान के साथ इसे बजाया जाता है। इसी तरह चिकारा का उपयोग भी लोक संगीत के लिए अनेक समुदायों में किया जाता है। राजनांदगांव जिले के गोंड़ आदिवासियों में रोंजो नामक वाद्य यंत्र का प्रचलन है, जिसे बांस की खपच्चियों को आड़े-तिरछे रूप में गूंथकर बजाया जाता है। राज्य के पारधी समुदाय में प्रचलित डांहक नामक वाद्य यंत्र को देव स्थान पर रखा जाता है और नवरात्रि के अवसर पर ही इसे बजाया जाता है। राज्य के गांवों में विभिन्न मांगलिक अवसरों पर टिमकी नामक वाद्य यंत्र का प्रचलन है। बैगा आदिवासी समुदाय करमा नृत्य के साथ चटकोला नामक वाद्य यंत्र का इस्तेमाल करते हैं। अलगोजा नामक वाद्य यंत्र दो बांसों को विपरित दिशाओं में जोड़ कर उनमें सुरों के हिसाब से छेद बना कर बजाया जाता है। मिट्टी के अधघड़ेनुमा बर्तन पर चमड़े को बांध कर बेंत के सहारे 'गुदुम' नामक वाद्य यंत्र बजाया जाता है। यह वाद्य यंत्र भी विभिन्न मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है। बस्तर का माड़िया आदिवासी समुदाय अपने लोक नृत्य के दौरान एक ढोलनुमा वाद्य यंत्र का उपयोग करता है, जिसे माड़िया ढोल कहा जाता है। इसके अलावा राज्य के विभिन्न परम्परागत समुदायों में भेर, मांदर, टूड, नकडेवन, हिरनांग, निशान, ढफड़ा, ठडका आदि पुराने लेकिन आज भी लोकप्रिय अनेक वाद्य यंत्र शामिल हैं।

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