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मानसिक तनाव का अध्ययन जरूरी
अन्यथा जीवन बन जायेगा अनसुलझा रहस्य - श्री नरसिम्हन
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री ई.एस.एल. नरसिम्हन ने रायपुर में भारतीय मनोचिकित्सा संघ द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय मध्यावधि सतत् मेडिकल शिक्षा कार्यक्रम के शुभारंभ सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के बिना स्वास्थ्य संभव नहीं हैं। मानव का मस्तिष्क एक उपकरण, साधन तथा मशीन की तरह कार्य करता है और यह हमारी प्रसन्नता तथा दु:ख दोनों के लिए उतरदायी है। वर्तमान समय में मनुष्य तनाव से ग्रसित है। इसका परिणाम थकान, अवसाद तथा साइकोफिजिकल सामंजस्यता में कमी के रूप में दिखाई देता है। तनाव ही समस्याओं का असली जड़ है और इसके उन्मूलन के लिए व्यापक अध्ययन की जरूरत है, अन्यथा मानसिक अस्वस्था, जीवन को अनसुलझा रहस्य बना देगा।
मनोचिकित्सक विशेषज्ञों का यह राष्ट्रीय सम्मेलन मुख्य रूप से 'हर्षोन्माद एवं अवसाद' विषय पर केन्द्रित है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री नरसिम्हन ने आगे कहा कि मनोचिकित्सक देश के लोगों को स्वस्थ बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मनोचिकित्सकों को मानव मस्तिष्क से जुड़ी जटिल समस्याओं से जुझना पड़ता है। मस्तिष्क दृश्यमान नहीं हैं, इस कारण इसकी चिकित्सा के लिए मनोचिकित्सकों को दवाईयों तथा उपचार के अलावा ध्यान, योग, सिनोपसिस, आटोसजेशन्स आदि साधनों का भी उपयोग करना पड़ता है। श्री नरसिम्हन ने भगवत गीता के एक श्लोक का उदाहरण देते हुए कहा कि क्रोध से भ्रम पैदा होता है, जिससे डर पैदा होता है और इससे बुध्दि की क्षति होती है जिसका परिणाम पतन के रूप में होता है।
राज्यपाल ने कार्यक्रम के विषय 'हर्षो उन्माद एवं अवसाद' (बाई पोलर डिस्आर्डर इन स्पेशल पापुलेशन-न्यूवर पर्सपेक्टिव) पर कहा कि लगभग एक प्रतिशत जनता इस बीमारी से प्रभावित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 10 से 15 प्रतिशत इस बीमारी के मरीज आत्महत्या के द्वारा अपने जीवन का अन्त कर लेते हैं। मानव हमारा सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है और अगर कोई भी आत्महत्या के लिए विचार करता है तो उसे रोकने के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, चिकित्सकों तथा समाज के द्वारा तत्काल ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए, जिससे आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं में कमी लायी जा सके और इस बीमारी से ग्रस्त लोग भी स्वस्थ होकर एक अच्छी खुशहाल जिन्दगी जी से सकें। उन्होंने कहा कि परिवार सबसे अच्छा मानसिक सुरक्षा प्रदान कर तनावों के स्तर में भी कमी लाता है। हर्षोन्माद एवं अवसाद से ग्रस्त लोगों के लिए परिवार और मित्र सबसे अच्छे सहायक होते हैं। राज्यपाल ने नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद तथा ध्यान पर भी जोर दिया।
राज्यपाल ने कहा कि मनोचिकित्सा के क्षेत्र में काफी कुछ किये जाने की जरूरत है, विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य में प्रचलित टोनही प्रथा एवं बैगा-गुनिया का जिक्र किया और कहा कि अशिक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण मानसिक रोगों से ग्रसित मरीजों को विश्वास के माध्यम से इलाज कराने वाले लोगों की गिरफ्त में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत है मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं को व्यापक रूप से बढ़ाया जाए। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे मरीजों पर 'पागल' होने का बिल्ला न लगे और उनकी चिकित्सा पढ़े-लिखे चिकित्सकों द्वारा मानवीय सहानुभूति के साथ संभव हो सकें। उन्होंने महिला मनोचिकित्सकों द्वारा इस क्षेत्र में आने की तारीफ की और कहा कि ऐसे मरीजों के लिए धैर्य पूर्वक उनकी बात सुनने की क्षमता होनी चाहिए और महिलाओं में यह धैर्य अधिक होता है। राज्यपाल ने मनोचिकित्सा के संबंध में जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए स्वयंसेवी संगठनों, मीडिया कर्मियों तथा समाज के लोगों को भी आगे आने का आव्हान किया।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. लक्ष्मण चतुर्वेदी ने कहा कि मनोरोग और मनोविज्ञान पर आधारित पाठयक्रम दिल्ली जैसे विश्वविद्यालय के कामर्स आदि पाठयक्रम में अनिवार्य है। वैश्वीकरण के इस युग में जीवन शैली में आये परिवर्तन एवं बदले परिवेश से छात्रों-युवाओं में तनाव एवं अवसाद की वृध्दि हुई है, यह चिंता का कारण है। उन्होंने कहा कि मनोरोग से संबंधित शिक्षा में पी.एच.डी. एवं स्नातकोतर की शिक्षा के पाठयक्रम की सुविधा विश्वविद्यालय में उपलब्ध करायी जा सकती है। डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि समाज की अपेक्षाएं असीमित रूप में बढ़ी है और इन्हें पूरा करने में विश्वविद्यालय अपना पूरा योगदान करेगा।
भारतीय मनोचिकित्सक सोसायटी राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. इन्देला आर. रेड्डी ने कहा कि इस संगोष्ठी में पहली बार सभी परचे महिला मनोचिकित्सक पढ़ रही हैं यह एक रिकार्ड है। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होने के बावजूद मनोरोग होने के कारणों में समानता है, इन्हें समझकर उपचार करने का प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अनेक पारिवारिक-सामाजिक समस्याओं के अलावा आतंकवाद तथा नक्सवाद के पीछे भी मानसिक अवसाद एक कारण है। सोसायटी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. आर. आर. घोष ने भी संगोष्ठी को संबोधित किया।
संगोष्ठी के आयोजक समिति के अध्यक्ष डॉ. पी.एन. शुक्ला ने देशभर से आये मनोरोग चिकित्सकों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन आयोजन समिति के सचिव डॉ. ए. परियल ने किया। संगोष्ठी में सांसद श्री गोपाल व्यास सहित देशभर से आये मनोचिकित्सकों उपस्थित थे।
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