Chhattisgarh Chief Minister raises many demands in Planning Commission Meeting

Support price for small forest produce
Some modification in Forest right act
Sub health center in every Panchayat
Rice Research Center in Chhattisgarh
Stop cutting of APL rice quota
Reduction of interest rate in agriculture loan to 4 percent

योजना आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उठाई अनेक मांगे
लघु वनोपजों के लिए भी घोषित हो समर्थन मूल्य नीति
वन अधिकार कानून में आंशिक संशोधन की जरूरत
हर ग्राम पंचायत में खोला जाए उप स्वास्थ्य केन्द्र
छत्तीसगढ़ में चावल अनुसंधान केन्द्र खोलने की मांग
ए.पी.एल. चावल के कोटे में कटौती बंद की जाए
कृषि ऋणों पर ब्याज दर घटाकर चार प्रतिशत की जाए

रायपुर, 28 मार्च 2008 - छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आज नई दिल्ली में आयोजित योजना आयोग की बैठक में देश के करोड़ों वन वासियों और ग्रामीणों के व्यापक हित में अनेक मुद्दों की ओर केन्द्र का ध्यान आकर्षित किया। मुख्यमंत्री ने बैठक में धान और गेहूं की तरह लघु वनोपजों के उपार्जन के लिए भी केन्द्र सरकार से एक न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति घोषित करने की मांग की, ताकि उन्हें वनोपज संग्रहण के लिए उचित मूल्य प्राप्त हो सके। उन्होंने कहा कि इससे नक्सलवाद की समस्या को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान की स्थापना की भी मांग रखी।

डॉ. सिंह ने केन्द्र सरकार के परम्परागत वन निवासी (वन अधिकार मान्यता )अधिनियम 2006 को विसंगतिपूर्ण बताते हुए कहा है कि यदि इसके एक वाक्य में आंशिक संशोधन नहीं किया जाएगा तो इससे छत्तीसगढ़ में लगभग दो लाख ऐसे वनवासी परिवारों को इसका लाभ नहीं मिल पाएगा, जो जंगल की सीमा से लगे हुए क्षेत्र में रहते हैं लेकिन उनकी खेती जंगल के अंदर है, जबकि इस अधिनियम के एक वाक्य में केवल उन वनवासियों को अधिकार पत्र देने की बात कही गई है जो कि मूल रूप से जंगल के भीतर रहते हैं, जबकि ऐसे वनवासी, जिनकी खेती वनों के भीतर है लेकिन जो वहां न रहकर वन क्षेत्रों के नजदीक रहते हैं, उन्हें वर्तमान स्वरूप में इस अधिनियम का लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए इसमें आंशिक संशोधन की जरूरत है।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत कम जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों के सभी ग्राम पंचायत मुख्यालयों में उप स्वास्थ्य केन्द्र खोलने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि इस मिशन के अन्तर्गत वर्तमान में सामान्य क्षेत्रों में प्रत्येक पांच हजार की आबादी पर और आदिवासी क्षेत्रों में तीन हजार की आबादी पर उप स्वास्थ्य केन्द्र खोलने का प्रावधान है लेकिन यह प्रावधान बिखरी हुई बसाहटों और कम जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों के हित में नही है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं में और अधिक सुधार लाने की दृष्टि से उप स्वास्थ्य केन्द्रों को ग्राम पंचायत क्षेत्रों के दायरे में खोला जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करने में यह काफी सहायक होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप के आधार पर संचालित करना पिछड़े राज्यों के लिए उपयुक्त नहीं होगा। उन्होंने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में संचालित करने की जरूरत बताई।

मुख्यमंत्री ने बैठक में छत्तीसगढ़ जैसे कोयला उत्पादक राज्यों की खनिज रायल्टी में वृध्दि के लिए कोयले की रायल्टी को एडवेलोरम अर्थात पूर्ण रूप से बाजार मूल्य पर आधारित किए जाने की जरूरत पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में लगभग 80 प्रतिशत राजस्व हमें कोयले की रायल्टी से मिलता है। एडवेलोरम या प्रचलित बाजार मूल्य पर रायल्टी मिले तो इसमें और वृध्दि हो सकती है। वर्तमान में कोयले के लिए रायल्टी की प्रक्रिया विसंगतिपूर्ण है।

डॉ. रमन सिंह ने बैठक में कहा कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अन्तर्गत कृषि उत्पादन में वृध्दि के लिए लघु सिंचाई के अन्तर्गत आने वाले घटकों-जैसे नलकूप, कुंआ और पम्प सेट्स तथा 100 एकड़ तक सिंचाई क्षमता वाले माईक्रो सिंचाई तालाबों के लिए भी कृषि क्षेत्र के लिए राशि के आवंटन में राज्य शासन के व्यय को भी शामिल किया जाना चाहिए।

उन्होंने कृषि ऋणों पर केन्द्र द्वारा वर्तमान में प्रचलित 07 प्रतिशत ब्याज दर को घटाकर चार प्रतिशत करने, कृषि साख सुविधाओं के लिए अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की अनुशंसाओं को लागू करने, तथा लघु और सीमांत किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के अन्तर्गत क्रेडिट गारंटी कोष की स्थापना करने का भी सुझाव दिया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में छत्तीसगढ़ को वर्ष 2007-08 में सिर्फ 58 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे, जो कि लघु सिंचाई योजनाओं सहित कृषि पम्पों के विद्युतीकरण पर हो रहे खर्च को देखते हुए पर्याप्त नहीं है। इसमें संशोधन करते हुए यह आवंटन वर्ष 2007-08 के लिए 137 करोड़ रूपए और वर्ष 2008-09 के लिए 300 करोड़ रूपए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अन्तर्गत चावल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राज्य के 18 में से सिर्फ 10 जिलों को शामिल किया गया है, जबकि शेष आठ जिलों को भी इसमें लिया जाना चाहिए, जिनमें आदिवासी बहुल क्षेत्र भी शामिल हैं, जहां धान की उत्पादकता कम है। उन्होंने कहा कि इस मिशन में राज्य के किसी भी जिले को गेहूं के घटक में नहीं शामिल किया गया है, जबकि राज्य के सरगुजा, जशपुर, कोरिया और बिलासपुर जिलों में गेहूं उत्पादन की काफी संभावनाएं है।

मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ में धान का प्रति हेक्टेयर उत्पादन राष्ट्रीय औसत का लगभग तीन चौथाई है। हमारे राज्य में धान की लगभग 19 हजार प्रजातियां और उनके जर्म प्लाज्म उपलब्ध है। इन सबको देखते हुए छत्तीसगढ़ में चावल केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान की स्थापना की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जल प्रबंधन और सिंचाई सुविधाओं को भी बढ़ावा देने की जरूरत है। राज्य में वर्तमान सिंचाई क्षमता 29 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 49 प्रतिशत का है। डॉ. सिंह ने कहा कि सिंचाई परियोजनाओं में अधिक से अधिक निवेश की जरूरत है। वर्तमान में इसके लिए केन्द्रीय आवंटन केवल 100 करोड़ रूपए है, जिसे बढ़ाकर 300 करोड़ रूपए किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने वन संरक्षण अधिनियम के तहत फारेस्ट क्लियरेंस नहीं मिलने के कारण लंबित सिंचाई योजनाओं का मामला मैने राष्ट्रीय विकास परिषद की 54 वीं बैठक में भी उठाया था। उन्होंने कहा कि राज्य में सिंचाई अधोसरंचनाओं के विकास के लिए इस पर योजना आयोग को ध्यान देना पड़ेगा।

योजना आयोग की आज की बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप आंगनबाड़ी केन्द्रों में पोषण आहार आपूर्ति के लिए ठेकेदारी प्रथा को एक अप्रैल 2007 से बंद कर ताजा और गर्म पका हुआ भोजन देने की योजना हम ग्राम पंचायतों और महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संचालित कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए केन्द्र से हमे एक लाख मीटरिक टन के विरूध्द अब तक सिर्फ 56 प्रतिशत अर्थात 56 हजार टन अनाज का आवंटन मिला है। शेष अनाज की व्यवस्था करने के लिए राज्य सरकार के खजाने पर 85 करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ आया है। इस पर आयोजना आयोग को विचार करना होगा, क्योंकि छत्तीसगढ़ में 0 से 3 वर्ष आयु समूह के 52 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत (46 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। इसी तरह राज्य में 63 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं खून की कमी अथवा एनीमिया से पीड़ित होती है, यह भी राष्ट्रीय औसत (58 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है।

मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में छत्तीसगढ़ के प्रति भेदभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि चावल के केन्द्रीय पूल में छत्तीसगढ़ 16 प्रतिशत का योगदान देता है। इसके बावजूद हमारे ए.पी.चावल के कोटे में 94 प्रतिशत की कटौती कर दी गयी है, जबकि यह कटौती आन्ध्रप्रदेश के लिए सिर्फ 0.2 प्रतिशत, कर्नाटक के लिए 12 प्रतिशत और तमिलनाडु के लिए 26 प्रतिशत है। इस प्रकार यह छत्तीसगढ़ के लिए भेदभाव पूर्ण है। उन्होंने कहा कि पोषण आहार कार्यक्रम सहित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी छत्तीसगढ़ के लिए अनाज का आवंटन बढ़ाना चाहिए। ए.पी.एल. चावल के छत्तीसगढ़ के हिस्से में कटौती को तत्काल बंद किया जाना चाहिए।

डॉ. रमन सिंह ने राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के लिए राज्य के 18 में से सिर्फ तीन जिलों को मंजूरी मिली है, जबकि सभी 18 जिलों को इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें 283 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भवनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रूपए और छह हजार उचित मूल्य दुकानों के भवन निर्माण के लिए 90 करोड़ रूपए की जरूरत है।

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