रायपुर, 16 अप्रैल 2008 - छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के विकासखंड सक्ती में ग्राम पंचायत धनपुर के मछुआरों को अपने गांव के नाम के अनुरूप धन कमाने का एक अच्छा साधन मिल गया है। मछली पालन के अपने परम्परागत व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए चिंतित इस गांव के ओमप्रकाश, रनसिंह, सितुराम, दुलारे सिंह, मुखीराम, श्यामलाल, बाबूलाल, मोहित राम और सम्मेलाल को जब यह जानकारी मिली की 'नवा अंजोर' परियोजना में समहित समूह बना कर वे किसी भी मनपसंद व्यवसाय के लिए शासकीय अनुदान प्राप्त कर सकते हैं, तो इन युवाओं ने ग्राम सभा में अपना यह प्रस्ताव रखा और सर्व सम्मति से 'जय विश्वकर्मा मत्स्य पालन समहित समूह' का गठन किया।
परियोजना से जुड़ने पर और उनके प्रोजेक्ट को प्रशासकीय स्वीकृति मिल जाने पर उनको अनुदान की पहली किश्त में 22 हजार 500 रूपए प्राप्त हुए। इस राशि से उन्होंने एक स्थानीय तालाब को पट्टे पर लिया और मछली बीजों के साथ जाल भी खरीदा। मछली पालन और मत्स्य आखेट में जब उन्हें मुनाफा होने लगा तो उन्होंने मुनाफे की बचत करते हुए अनुदान की दूसरी किश्त प्राप्त करने बैक के फिक्स्ड डिपाजिट खाते में पांच हजार रूपए जमा किए। इस पर उन्हें अनुदान की अंतिम किश्त में 24 हजार रूपए प्राप्त हो गए। इस राशि से भी उन्होंने एक तालाब पट्टे पर लिया और मछली बीजों के साथ जाल भी खरीदा। अब इस समहित समूह के पास मछली पालन के लिए दो तालाब हो गए।
शुरूआती दिनों में उन्हें इस कार्य में कुछ परेशानियां भी आई। जैसे बारिश में तालाबों से मछलियों का बाहर बह जाना, रात में अज्ञात लोगों द्वारा मछलियों की चोरी करना आदि। इन तमाम चुनौतियों का उन्होंने हिम्मत के साथ मुकाबला किया और अपने कार्य में पूरी मेहनत और तल्लीनता से लगे रहे। मेहनत का मीठा फल अब उन्हें मिलने लगा है। वे अब हर सप्ताह दो से तीन बार तालाबों में जाल डालकर मछलियां निकालते हैं और स्थानीय गांव के अलावा आस-पास के साप्ताहिक हाट बाजारों में भी मछली बेच कर पर्याप्त अतिरिक्त आमदनी उन्हें होने लगी है। धनपुरी के युवाओं को नवा अंजोर परियोजना ने सचमुच धन कमाने का एक बेहतर जरिया उपलब्ध करा दिया है।
उल्लेखनीय है कि यह परियोजना राज्य के सभी पुराने 16 जिलों के अन्तर्गत चालीस चयनित विकासखंडों के दो हजार 023 ग्राम पंचायत क्षेत्रों में चल रही है। परियोजना के तहत एक लाख परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने का लक्ष्य है। इसके लिए स्थानीय ग्रामीणों के समहित समूह बना कर उनको विभिन्न मनपसंद व्यवसायों के लिए शासकीय अनुदान भी दिया जा रहा है। प्रत्येक समूह के हर सदस्य को अधिकतम तीस हजार रूपए अनुदान के तौर पर दिए जाते हैं।
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