छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में ली जाने वाली फसल 'कोदो' की प्रस्संकरण की कवायद शुरू हो गई है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने छत्तीसगढ़ के कृषि विभाग से कोदो और दीगर लघु-धान्य की ''प्रोसेसिंग'' करने के लिए मशीन का डिजाइन बनाने प्रस्ताव मांगा है। अभी भारत में इनकी ''प्रोसेसिंग'' के लिए कोई विशेष मशीन नहीं है। कृषि विभाग भी इसमें रुचि ले रहा है, ताकि बस्तर समेत छत्तीसगढ़ के किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम मिल सके।
''वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई'' में पिछले माह आयोजित ''आईटीएम एक्सपो 2008'' की प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ राज्य से ''आत्मा'' योजना के तहत ''माता रुपशिला लघु धान्य प्रस्संकरण समूह बडेमारेंगा तोकापाल'' बस्तर के उत्पाद को रखा गया था। इसमें कोदो, कुटकी, कोसरा, सांवा, मंड़िया व गटका आदि सौ रुपए से अधिक की कीमत पर बिके। कृषकों के लिए प्रसंस्करण के लिए आधुनिक मशीन का नहीं होना सबसे बड़ी समस्या है। इस संबंध में केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री श्री सुबोधकांत सहाय, भारत के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार डॉ आर चिदंबरम् और प्रोफेसर श्री अशोक झुनझुनवाला, आईआईटी चेन्नई से चर्चा की गई। अब विभाग को बडे निजी उद्यमियों से लगातार इस संबंध में संदेश प्राप्त हो रहे हैं। रायपुर के उपसंचालक कृषि श्री नागेश्वर लाल पाण्डे ने बताया कि ''आर्टिक फूड प्रोसेसिंग कंसलटेंट मुंबई'' ने उच्च गुणवत्ता की मशीन के डिजाइन तैयार करने के लिए प्रस्ताव मांगा है।
भारत में कोदो की ''प्रोसेसिंग'' की आधुनिक मशीन नहीं है। ऐसी मशीन किसानों को उपलब्ध हो जाए, तो लघु धान्य फसलों की ''प्रोसंसिंग'' अच्छे से हो जाएगी और उन्हें इनका अच्छा मूल्य मिलेगा। इस मशीन से लघु-धान्य के टूटने की संभावना कम हो जाएगी। चमक भी अच्छी होगी। ''एग्रीकल्चर मैनेजमेंट टेक्नॉलाजी एजेंसी- आत्मा'' भी इस पर विशेष ध्यान दे रही है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में शहीद गूण्डाधूर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंन्द्र कुम्हरावण्ड जगदलपुर ने लघु-धान्य फसलों की गुणवत्ता बताने विशेष कार्यशाला का आयोजन किया था और यह बताया गया था कि इससे रोगों का नियंत्रण कैसे होता है।
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